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द्रोण पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
अगारदाहिनां ये च ये च गां निघ्नतामपि |  ३१   क
अपचारिणां च ये लोका ये च व्रह्मद्विषामपि ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति