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द्रोण पर्व
अध्याय ९६
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं च त्रिभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सोऽष्टभिः |  ३०   क
दुःशासनः षोडशभिर्विव्याध शिनिपुङ्गवम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति