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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
आरुज्यारुज्य तौ वृक्षानन्योन्यमभिजघ्नतुः |  ४७   क
जीमूताविव घर्मान्ते विनदन्तौ महावलौ ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति