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द्रोण पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
कश्चिदाह्वय़तां सङ्ख्ये देशमन्यं प्रकर्षतु |  ६   क
तमजित्वा तु कौन्तेय़ो न निवर्तेत्कथञ्चन ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति