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द्रोण पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
अभिक्रोशन्ति भूतानि अन्तरिक्षे विशां पते |  २०   क
दृष्ट्वा निपतितं वीरं च्युतं चन्द्रमिवाम्वरात् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति