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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
आकर्णपूर्णाय़तसम्प्रय़ुक्तैः; शरैस्तदा संय़ति तैलधौतैः |  १२   क
अन्योन्यमाच्छादय़तां महारथौ; मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरश्च ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति