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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तूर्णं समरे महारथौ; परस्परस्यान्तरमीक्षमाणौ |  १३   क
शरैर्भृशं विव्यधतुर्नृपोत्तमौ; महावलौ शत्रुभिरप्रधृष्यौ ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति