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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
तय़ोर्धनुर्ज्यातलनिस्वनो महा; न्महेन्द्रवज्राशनितुल्यनिस्वनः |  १४   क
परस्परं वाणगणैर्महात्मनोः; प्रवर्षतोर्मद्रपपाण्डुवीरय़ोः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति