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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽतिविद्धोऽथ युधिष्ठिरोऽपि; सुसम्प्रय़ुक्तेन शरेण राजन् |  १७   क
जघान मद्राधिपतिं महात्मा; मुदं च लेभे ऋषभः कुरूणाम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति