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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादिव पार्थिवेन्द्रो; लव्ध्वा सञ्ज्ञां क्रोधसंरक्तनेत्रः |  १८   क
शतेन पार्थं त्वरितो जघान; सहस्रनेत्रप्रतिमप्रभावः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति