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उद्योग पर्व
अध्याय १७८
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भीष्म उवाच
न हि ते विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन |  १८   क
गृहाणेमां महावाहो रक्षस्व कुलमात्मनः |  १८   ख
त्वय़ा विभ्रंशिता हीय़ं भर्तारं नाभिगच्छति ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति