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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततः स शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् |  २   क
अभ्यवर्षदमेय़ात्मा क्षत्रिय़ान्क्षत्रिय़र्षभः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति