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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु मद्राधिपतिः प्रहृष्टो; धनुर्विकृष्य व्यसृजत्पृषत्कान् |  २०   क
द्वाभ्यां क्षुराभ्यां च तथैव राज्ञ; श्चिच्छेद चापं कुरुपुङ्गवस्य ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति