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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
अथापरेणास्य जहार यन्तुः; काय़ाच्छिरः संनहनीय़मध्यात् |  २६   क
जघान चाश्वांश्चतुरः स शीघ्रं; तथा भृशं कुपितो भीमसेनः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति