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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
तं चापि राजानमथोत्पतन्तं; क्रुद्धं यथैवान्तकमापतन्तम् |  ३०   क
धृष्टद्युम्नो द्रौपदेय़ाः शिखण्डी; शिनेश्च नप्ता सहसा परीय़ुः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति