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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
स मद्रराजः सहसावकीर्णो; भीमाग्रगैः पाण्डवय़ोधमुख्यैः |  ३४   क
युधिष्ठिरस्याभिमुखं जवेन; सिंहो यथा मृगहेतोः प्रय़ातः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति