शल्य पर्व  अध्याय १६

सञ्जय़ उवाच

निरीक्षितो वै नरदेव राज्ञा; पूतात्मना निर्हृतकल्मषेण |  ३९   क
अभून्न यद्भस्मसान्मद्रराज; स्तदद्भुतं मे प्रतिभाति राजन् ||  ३९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति