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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
सम्भूतः सम्भलग्रामे व्राह्मणावसथे शुभे |  ९०   क
मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्याय़ुधानि च |  ९०   ख
उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च ||  ९०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति