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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
गन्धस्रगग्र्यासनपानभोजनै; रभ्यर्चितां पाण्डुसुतैः प्रय़त्नात् |  ४३   क
संवर्तकाग्निप्रतिमां ज्वलन्तीं; कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्राम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति