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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
वलप्रय़त्नादधिरूढवेगां; मन्त्रैश्च घोरैरभिमन्त्रय़ित्वा |  ४६   क
ससर्ज मार्गेण च तां परेण; वधाय़ मद्राधिपतेस्तदानीम् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति