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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
नासाक्षिकर्णास्यविनिःसृतेन; प्रस्यन्दता च व्रणसम्भवेन |  ५०   क
संसिक्तगात्रो रुधिरेण सोऽभू; त्क्रौञ्चो यथा स्कन्दहतो महाद्रिः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति