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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
वाहू प्रसार्याभिमुखो धर्मराजस्य मद्रराट् |  ५२   क
ततो निपतितो भूमाविन्द्रध्वज इवोच्छ्रितः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति