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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
प्रिय़या कान्तय़ा कान्तः पतमान इवोरसि |  ५४   क
चिरं भुक्त्वा वसुमतीं प्रिय़ां कान्तामिव प्रभुः |  ५४   ख
सर्वैरङ्गैः समाश्लिष्य प्रसुप्त इव सोऽभवत् ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति