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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
धर्म्ये धर्मात्मना युद्धे निहतो धर्मसूनुना |  ५५   क
सम्यग्घुत इव स्विष्टः प्रशान्तोऽग्निरिवाध्वरे ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति