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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
शक्त्या विभिन्नहृदय़ं विप्रविद्धाय़ुधध्वजम् |  ५६   क
संशान्तमपि मद्रेशं लक्ष्मीर्नैव व्यमुञ्चत ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति