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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरश्चापमादाय़ेन्द्रधनुष्प्रभम् |  ५७   क
व्यधमद्द्विषतः सङ्ख्ये खगराडिव पन्नगान् |  ५७   ख
देहासून्निशितैर्भल्लै रिपूणां नाशय़न्क्षणात् ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति