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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
तं विव्याधाशुगैः षड्भिर्धर्मराजस्त्वरन्निव |  ६१   क
कार्मुकं चास्य चिच्छेद क्षुराभ्यां ध्वजमेव च ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति