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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
तस्यापकृष्टशीर्षं तच्छरीरं पतितं रथात् |  ६४   क
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं दृष्ट्वा सैन्यमभज्यत ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति