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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
सर्वास्ववस्थासु हितावर्जुनस्य मनोनुगौ |  ८२   क
वहुमानात्प्रिय़त्वाच्च तावेनं वक्तुमर्हतः ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति