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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा हय़ांश्चास्य त्रिभिः शरैः |  ७२   क
चापमेकेन चिच्छेद हार्दिक्यो नतपर्वणा ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति