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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
युधिष्ठिरं च प्रशशंसुराजौ; पुरा सुरा वृत्रवधे यथेन्द्रम् |  ८७   क
चक्रुश्च नानाविधवाद्यशव्दा; न्निनादय़न्तो वसुधां समन्तात् ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति