आदि पर्व  अध्याय १६०

गन्धर्व उवाच

स हि तां तर्कय़ामास रूपतो नृपतिः श्रिय़म् |  २५   क
पुनः सन्तर्कय़ामास रवेर्भ्रष्टामिव प्रभाम् ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति