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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
एवमुक्तास्ततः कृष्ण सुरास्ते शूलपाणिना |  १७२   क
ऊचुः प्राञ्जलय़ः सर्वे नमस्कृत्वा वृषध्वजम् ||  १७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति