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शान्ति पर्व
अध्याय १०९
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भीष्म उवाच
नैतानतिशय़ेज्जातु नात्यश्नीय़ान्न दूषय़ेत् |  १०   क
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम् |  १०   ख
कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान्प्राप्स्यसे च जनाधिप ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति