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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वं शृणुष्व माद्रेय़ यदेतत्परिपृच्छसि |  १०   क
प्रवोधितोऽस्मि भवता धातुमानिव पर्वतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति