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शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
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भीष्म उवाच
राजा धर्मपरः सदा शुभगोप्ता; समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान् |  २७   क
वहुविधमपि चरतः प्रदिशति; सुखमनुपगतं निरवद्यम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति