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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
भूतसर्गमिमं कृत्वा सर्वलोकपितामहः |  २१   क
शाश्वतं वेदपठितं धर्मं च युय़ुजे पुनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति