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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
पुष्पोपगं वाथ फलोपगं वा; यः पादपं स्पर्शय़ते द्विजाय़ |  ३६   क
स स्त्रीसमृद्धं वहुरत्नपूर्णं; लभत्ययत्नोपगतं गृहं वै ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति