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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
न प्रिय़ं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत |  ३०   क
त्रीनुपाय़ानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः |  ३०   ख
न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति