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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
शतय़ोजनविस्तारे मणिमुक्ताचय़ाचिते |  ३२   क
तस्मिन्गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने |  ३२   ख
तस्थौ स विवुधश्रेष्ठो व्रह्मा लोकार्थसिद्धय़े ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति