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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
महानदीं हि पारज्ञस्तप्यते न तरन्यथा |  ५३   क
एवं ये विदुरध्यात्मं कैवल्यं ज्ञानमुत्तमम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति