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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
नीलोत्पलसवर्णाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं कृशोदरम् |  ३८   क
प्रांशु दुर्दर्शनं चैवाप्यतितेजस्तथैव च ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति