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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तद्रूपमुत्सृज्य वभौ निस्त्रिंश एव सः |  ४३   क
विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यतः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति