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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स भगवान्रुद्रो व्रह्मर्षिगणसंस्तुतः |  ४५   क
प्रगृह्यासिममेय़ात्मा रूपमन्यच्चकार ह ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति