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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्वाहुः स्पृशन्मूर्ध्ना भूस्थितोऽपि नभस्तलम् |  ४६   क
ऊर्ध्वदृष्टिर्महालिङ्गो मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् |  ४६   ख
विकुर्वन्वहुधा वर्णान्नीलपाण्डुरलोहितान् ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति