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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
विभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् |  ४७   क
नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं महत् |  ४७   ख
शुशुभाते च विमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति