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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा |  ४८   क
सम्प्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालार्कानलसंनिभम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति