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शान्ति पर्व
अध्याय १२१
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भीष्म उवाच
सर्वप्रहरणीय़ानि सन्ति यानीह कानिचित् |  १७   क
दण्ड एव हि सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति