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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
अश्मभिश्चाप्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः |  ५२   क
घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः शितधारैरय़ोमुखैः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति