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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
भूमिं केचित्प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा |  ५८   क
अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति